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देश में पढ़े-लिखे मुस्लिम युवाओं के लिए रोजगार पाने के अवसर कम

देश में पढ़े-लिखे मुस्लिम युवाओं के लिए रोजगार पाने के अवसर कम

देश में 2011 की जनगणना के मुताबिक पहली बार धर्म के आधार पर कामकाज के आंकड़े सार्वजनिक हुए हैं। इससे पता चलता है कि भारत में मुसलमानों का प्रतिशत नौकरियों में सबसे कम है।

कामकाजी उम्र वाले एक तिहाई मुसलमान ही नौकरियों में हैं, बाकी या तो कुछ अपना ही काम कर रहे हैं या बेरोजगार हैं। इन आंकड़ों को देखते हुए 2006 में लोकसभा में पेश की गई जस्टिस सच्चर कमेटी की रिपोर्ट की ओर ध्यान जाना स्वाभाविक है।

इसमें साफ शब्दों में कहा गया था कि भारत में मुसलमानों के बीच वंचित होने की भावना बहुत आम है। देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति के विश्लेषण के लिए आजादी के बाद कोई ठोस पहल नहीं की गई।

इससे पहले 1983 में ही सरकार यह स्वीकार कर चुकी थी कि मुसलमानों के बीच यह धारणा आम है कि सरकार चाहे केंद्र की हो या राज्यों की, आर्थिक नीतियों का फायदा वह अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और समाज के कमजोर तबकों तक नहीं पहुंचा पाती।

सच्चर कमेटी ने और व्यापक दायरे में जाकर गहराई से ऐसे क्षेत्रों में उनकी आर्थिक गतिविधियों का जायजा लेने की कोशिश की गई थी। यूपीए सरकार ने सच्चर कमेटी की कुछ सिफारिशों पर अमल किया और कुछ को आगे के लिए छोड़ दिया, लेकिन आज भी यह जानने की जरूरत कम नहीं हुई है कि पढ़े-लिखे मुस्लिम युवाओं के लिए नौकरी पाने के अवसर इतने कम क्यों हैं।

वजह जो भी हो, इतना तय है कि इस समुदाय के अधिकतर लोगों की दिलचस्पी अपने पुश्तैनी, पारंपरिक कार्यों तक ही सीमित दिखाई पड़ती है। हां, इधर मुस्लिम लड़कियों में शिक्षा के प्रति झुकाव और नौकरी का आकर्षण जरूर देखा जा रहा है।

यही कारण है कि जनगणना के आंकड़ों में नौकरीशुदा मुस्लिम महिलाएं 15 फीसदी के साथ सिख महिलाओं की बराबरी करती नजर आती हैं। देश में इस वक्त 48.20 करोड़ लोग कोई न कोई काम करके अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं। इनमें 55 फीसदी खेतीबाड़ी से ही जुड़े हैं।

भारत के लिए ये आंकड़े एक किस्म की चेतावनी है, क्योंकि यह स्थिति 2001 की जनगणना से बहुत अलग नहीं है। दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी का भरपूर लाभ लेना है तो हमें कारोबार और नौकरियों का दायरा तेजी से बढ़ाना होगा।

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