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चुनावी घोषणापत्रों में लंबे वायदों के बाद भी सरकारी शिक्षा पर खर्च में कंजूसी

चुनावी घोषणापत्रों में लंबे वायदों के बाद भी सरकारी शिक्षा पर खर्च में कंजूसी

पिछले दिनों केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने दावा किया कि शिक्षा पर केंद्र और राज्य सरकारों का खर्च मिलाकर देश के कुल जीडीपी का 4.5 फीसदी खर्च किया जा रहा है। यह दावा कुछ इस तरह किया गया था, जैसे शिक्षा पर खर्च अचानक बहुत बढ़ा दिया गया हो और इससे भारत के शिक्षा क्षेत्र की तकदीर ही बदल जाने ही वाली हो। 

आज से आधी सदी पहले कोठारी कमिशन ने शिक्षा पर जीडीपी का 6 प्रतिशत खर्च करने की सिफारिश की थी। उसके बाद अनेक शिक्षा नीतियों और चुनाव घोषणापत्रों में इसका वादा किया गया, लेकिन आज तक यह लक्ष्य पूरा न हो सका। और तो और, जावड़ेकर खर्च का जो आंकड़ा दे रहे हैं, खर्च असल में उसके दो तिहाई से भी कम हो रहा है।

अगर वर्ष 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो सीधे कहा जा सकता है कि शिक्षा मंत्री गलत बयानबाजी कर रहे हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक इस साल एजुकेशन पर कुल खर्च जीडीपी का 2.9 प्रतिशत ही हो पाया है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले दो वर्षों में शिक्षा पर सरकारी खर्च बढ़ ही नहीं सका है।

वर्ष 2007-08 में यह 2.59 प्रतिशत के निम्नतम स्तर पर था, जबकि 2009-10 से लेकर 2013-14 तक लगातार 3.1 प्रतिशत के उच्च स्तर पर रहा। इसी तरह सर्वशिक्षा अभियान पर भी खर्च लगातार कम हो रहा है। वर्ष 2015-16 में चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिशें मानी गईं, जिसके तहत इस अभियान में राज्य सरकारों का हिस्सा 40 फीसदी तय हुआ।

इससे पहले उनका योगदान 25 प्रतिशत होता था, लेकिन तब भी वे अपना लक्ष्य पूरा नहीं कर पाती थीं। दरअसल शिक्षा पर खर्च का गणित बिगाडऩे का दोष केंद्र से ज्यादा राज्यों के सिर जाता है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार चौदहवें वित्त आयोग की अनुशंसाओं के बावजूद 17 राज्यों ने शिक्षा और अन्य सामाजिक-आर्थिक क्षेत्रों में खर्च नहीं बढ़ाया है।

शिक्षा राज्य सरकारों की प्राथमिकता में नहीं

केंद्र ने अपनी आमदनी में राज्यों का हिस्सा 32 प्रतिशत से बढ़ाकर 42 प्रतिशत कर दिया, साथ ही अपने हिस्से के बहुत सारे खर्चे भी उन पर डाल दिए, लेकिन राज्यों की प्राथमिकताएं ही कुछ और हैं। उनके राजनीतिक नेतृत्व के लिए शिक्षा कोई लोकलुभावन विषय तो है नहीं।

जहां भोजन, बिजली, पानी और सडक़ के लिए ही मारामारी हो, वहां शिक्षा पर खर्च बढ़ाने से भला वोट कहां बढऩे वाले हैं? गांवों में बच्चे पढऩे के लिए नहीं, मिड डे मील के लिए स्कूल जाते हैं, फिर क्वालिटी एजुकेशन की बात कौन करे? ऐसे में शिक्षा को नौकरशाही के भरोसे छोड़ दिया गया है।

शिक्षा विभागों को फुर्सत नहीं कि वे बदलते वक्त के साथ शिक्षा के स्वरूप में बदलाव की बात सोचें। न तो शिक्षकों की संख्या बढ़ाई जा रही है, न ही उनकी नियुक्ति और प्रशिक्षण की प्रक्रिया में कोई बदलाव आया है। कुल मिलाकर
शिक्षा राजनेताओं और नौकरशाहों के लिए खाने-कमाने का जरिया बनी हुई है। अगर हमारे मन में देश को लेकर कोई बड़ा स्वप्न है तो यह स्थिति तत्काल बदलनी होगी।
(साभार : एनबीटी)

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